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Saturday, 29 September 2012

शास्त्रों में मांस भक्षण का विधान है अथवा नहीं


पाश्चात्य एवम म्लेच्छ सभ्यता की देन के कारन  इसका दुष्प्रचार बढ़ गया है, किन्तु सनातन धर्म  मांस -भक्षण की आज्ञा नहीं देता और देता भी है तो मात्र विशेष परिस्थितियों में तथा जाती विशेष के लिए ही |
कुछ विधर्मी लोगो का कहना है कि '' ब्राह्मणग्रंथो, श्रौत सूत्रों ,उपनिषदों आदि तक में मांस खाना लिखा है | इस शंका समाधान के लिए हमें शास्त्र के विभिन्न पहलुओ को ध्यान में रखना पड़ेगा क्योकि शास्त्रों इसका उल्लेख अलग- अलग आशयों से किया गया है |
यहाँ यह बताना आवश्यक है कि शास्त्रों में विधि नहीं ,परिसंख्या है जिसका अर्थ है - किसी अव्यवस्थित प्रवत्ति को सीमित करके शनैः -शनैः उससे निवृत्त करना |
श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध में इस समस्या पर निर्णय दिया गया है -

                                  लोके व्यवायामिषमद्यासेवा, नित्यास्तु जन्तोर्नहि  तत्र चोदना |
                                   व्यवस्थितिस्तत्र विवाहयज्ञसुराग्रहैरासु निव्रत्तिरिषटा       || श्रीमद्भागवत११ /४११

अर्थात्-संसार में मद्य  मांस और व्यभिचार से तीन प्रधान दुर्व्यसन स्वाभाविक है |इनके लिए शास्त्र विधि और प्रचार की आवश्यकता नहीं है ,क्योकि पशु पक्षी आदि योनियों में भटकते हुए -आज नर शरीरधारी भी हम पूर्वजन्मों में सतत अभ्यास के कारन देखने में नर
किन्तु रहन -सहन में अब भी पशु प्रवत्ति के कारन कोरे जंतु है ,इसलिए उक्त दुर्व्यसनो की प्रवात्ति की रोकथाम के लिए विवाह ,यज्ञ और सुराघ्राण की व्यवस्था की गयी |
ब्राह्मण ग्रंथो के बहुत से प्रकरणों में मांस ,मेद, छाग, अजा आदि शब्दों को देखकर ही वैदिक अर्थ प्रणाली को न जानने वाले भ्रमोत्पादन कर लेते है परन्तु शतपथ ब्राह्मन में उक्त सब शब्दों की परिभाषाये नियुक्त कर दी गयी है |
वहा एक दीर्घ प्रकरण देकर यह प्रकट किया गया है -

1-ब्रीहीयवौ............यदा विष्टान्यथ लोमानि भवन्ति ,यदापआनयत्यथ त्वग़ भवति | यदा स यौत्यथ मांसम भवति  | ''शत्पथ  १ / २ / १ / ८ ''

अर्थात -वह तत्व अनेक पदार्थो में अपक्रमण करता हुआ ब्रीही और यव में मिला |सो जब धान और जौ को पीसा जाये तो उस चूर्ण को याज्ञिक भाषा में '''लोम''' कहते है ,जब उस आटे को गूँधा जाये तो उस पीठी को ''त्वक्''' कहते है जब पीठी को घी में पकाया जाये
 तो उसे मांस कहते है | गूदे और गिरी का तो मांस के अतरिक्त और कोई नाम ही नहीं है |
एतद ह वै परममन्नाद्यम यं मांसम|| '''शत्पथ ११ / ७ '''
अर्थात -परमान्न का नाम मांस है |
 परमा न्नम  तु पायसं | '''अमरकोष २ / ७ / २५ ''''
अर्थात -परमान्न खीर को कहते है |
यदिमा आप एतानि मन्सानि | ''शत्पथ  ७ / ४ / २ ''
अर्थ -इन जलो को मांस कहते है |
तोक्मानि मांसम | शत्पथ ''८ / ३ ''
अर्थ -तोकम का नाम मांस है |
तोक्मशब्देन  यवा विरुढ उच्यन्ते | '''कात्यायन सूत्र  कर्क भाष्य १८ '''
अर्थ -हरे जौ को तोक्म कहते है|
तस्य यन्मान्सम समसोत्त्द गुग्गुल्वाभवत | ''ताण्डय २४ /१३ / ५ ''
अर्थ उस व्रक्ष के मांस {गूदा } से गुग्गुल बना है |
इसी प्रकार च्यवनप्राश में पड़ने वाले एक कंदा का नाम ऋषभक है ,वृषभ ,गो ,धेनु आदि उसके पर्यायवाची है |इसी प्रकार मुन्नका को गोस्तनी ,गोभी को गोजिव्हा ,घीक्वार {elovera}के गूदे को कुमारिका मांस कहते है |
गाय सम्बन्धी समस्त पदार्थो को ''गव्य'' एवं वैदिक प्रक्रिया में '''गाव'''कहते है,तथा छागा बकरी के दूध को ''छाग ''कहते है |

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